आखिर ये रेसिप्रोकल टैरिफ क्या चीज़ है और यह भारतीय किसानों को कितना नुकसान कर सकता है | इस रिपोर्ट में जाने
किसान साथियो और व्यापारी भाइयों कई दिनों से भारत में रेसिप्रोकल टैक्स को लेकर काफी चर्चाएं हो रही है। किसानों के हितेषी और व्यापार संगठन मान रहे हैं कि अगर अमेरिका के दबाव में भारत झुका तो भारतीय किसानों को इससे भारी नुकसान हो सकता है । एक ऐसी स्थिति जब किसानों को उनकी ज्यादातर फसलों का MSP तक का रेट नहीं मिल रहा है अगर ऐसे में रेसिप्रोकल टैक्स को लागू कर दिया तो यह किसानों के लिए बहुत ही ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है। आज की रिपोर्ट भी हम इस स्थिति को ठीक से समझने की कोशिश करेंगे और यह जानने की कोशिश करेंगे कि भारत के पास क्या-क्या विकल्प है।
भारत के किसान पहले ही महंगाई, लागत और जलवायु संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। अब उनके सामने एक और नया संकट खड़ा हो गया है – वो भी सात समंदर पार अमेरिका से। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के खिलाफ ‘Reciprocal Tariff’ यानी बदले के टैरिफ की धमकी दी है। उनका कहना है कि अगर भारत अमेरिका के उत्पादों पर ज्यादा टैक्स लगाता है, तो अमेरिका भी भारत के उत्पादों पर उतना ही टैक्स लगाएगा। नोट :- अगर आपको धान, चावल, सरसों, सोयाबीन, और चना के लाइव भाव whatsapp पर चाहिए तो आप 500 रुपए दे कर 6 महीनो तक लाइव भाव की सर्विस ले सकते है | जिन्हे लेनी है वही व्हाट्सअप पर मैसेज करे 9518288171 इस नंबर पर खाली भाव पूछने के लिए काल या मैसेज ना करे |
कौन कितना टैक्स लगाता है
भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों पर औसतन 39% टैक्स (टैरिफ) लगाता है, जबकि अमेरिका भारत के कृषि उत्पादों पर सिर्फ 5%। अगर दोनों बराबरी पर आ गए, तो भारत के किसानों को दोहरा नुकसान होगा –
1. अमेरिका के सस्ते और सब्सिडी वाले उत्पाद भारत में घुस आएंगे।
2. भारत के किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे साबित होंगे, जिससे उनका निर्यात घट जाएगा।
किन उत्पादों को होगा सबसे ज्यादा नुकसान
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है (230 लाख टन सालाना)। इसके बावजूद अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देश भारत पर दबाव बना रहे हैं कि वह अपने डेयरी बाजार को खोले। अगर ऐसा हुआ, तो देश के छोटे डेयरी किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच जाएंगे। ऐसा ही हाल कपास और सेब जैसे फसलों का है। अमेरिका में सिर्फ 8000 किसान कपास उगाते हैं, जबकि भारत में 98 लाख। लेकिन अमेरिकी किसान को एक लाख डॉलर से ज्यादा की सब्सिडी मिलती है, जबकि भारतीय किसान को मुश्किल से ₹2000-₹3000।
नॉन टैरिफ चालबाज़ी भी बड़ा हथियार
अमेरिका सिर्फ टैक्स ही नहीं, बल्कि नॉन-टैरिफ बैरियर भी लगाता है – यानी नियम-कायदे इतने कठिन बना देता है कि भारत का उत्पाद अमेरिका पहुंच ही नहीं पाता।
- अमेरिका ने भारत के आम (मैंगो) को रोकने के लिए एक महंगा रेडिएशन सिस्टम बना रखा है
- भारत से सिर्फ 600 नॉन टैरिफ बैरियर, जबकि अमेरिका में 9000 से ज्यादा
- 60% भारतीय एक्सपोर्ट अमेरिका में इन्हीं गैर-ज़रूरी नियमों की वजह से रुक जाता है
भारत के पास क्या क्या हैं विकल्प
1. भारत को भी अमेरिका जैसे नियम (नॉन-टैरिफ बैरियर) लागू करने चाहिए
2. किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी बढ़ानी चाहिए – WTO के नियमों के तहत भारत 10% तक सब्सिडी दे सकता है
3. आत्मनिर्भरता की असली परिभाषा पर टिके रहना होगा – यानी देश की ज़रूरत का उत्पादन देश के किसान से हो
खाद्य तेलों की तरह हो सकता है हाल
आज भारत खाद्य तेल में आत्मनिर्भर नहीं रहा – क्योंकि हमने टैक्स घटा दिए और बाहर से सस्ता तेल आने दिया। अगर यही हाल दूध, कपास, धान, और फल-सब्जियों में हुआ, तो देश को रोज़ी-रोटी के लिए भी बाहर झांकना पड़ेगा।
किसान साथियो और व्यापारी भाइयो, यह सिर्फ किसानों और व्यापार का मुद्दा नहीं है – यह देश की खेती, किसानों की रोज़ी, और खाद्य सुरक्षा का सवाल है। अमेरिका की दबाव की नीति के सामने भारत को मजबूती से खड़ा होना होगा।
आत्मनिर्भर भारत का मतलब यही है – अपनी धरती, अपना अन्नदाता और अपना भोजन।
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About the Author
मैं लवकेश कौशिक, भारतीय नौसेना से रिटायर्ड एक नौसैनिक, Mandi Market प्लेटफार्म का संस्थापक हूँ। मैं मूल रूप से हरियाणा के झज्जर जिले का निवासी हूँ। मंडी मार्केट( Mandibhavtoday.net) को मूल रूप से पाठकों को ज्वलंत मुद्दों को ठीक से समझाने और मार्केट और इसके ट्रेंड की जानकारी देने के लिए बनाया गया है। पोर्टल पर दी गई जानकारी सार्वजनिक स्रोतों से प्राप्त की गई है।