गेहूं काटने के बाद बस यह काम कर लेना | अगली फसल भर देगी भंडार
किसान साथियों मार्च के महीने मे होली तक प्रदेश में गेहूं की फसल की कटाई पूरी हो जाती है। इसके बाद किसानों को सबसे पहला कदम मिट्टी की जांच करवाना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिससे खेत की मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की सही जानकारी प्राप्त की जा सकती है। लगातार खेती करने से मिट्टी में कुछ आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है। मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखना किसी भी फसल उत्पादन के लिए अनिवार्य होता है। विशेष रूप से, गेहूं की कटाई के बाद किसान को अपनी मिट्टी की जांच करानी चाहिए। यह जांच न केवल मिट्टी की उर्वरता का आकलन करती है, बल्कि इसमें मौजूद पोषक तत्वों और आवश्यक सुधारों की जानकारी भी प्रदान करती है। मिट्टी की जांच करने से उसमें उपलब्ध नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य आवश्यक खनिजों की मात्रा की सही जानकारी मिलती है। इसके साथ ही, किसान को यह भी पता चलता है कि मिट्टी में किसी तत्व की कमी है या अधिकता। अधिकतर खेतों में लगातार फसल उत्पादन के कारण मिट्टी में अम्लीयता, क्षारीयता या लवणीयता की समस्या उत्पन्न हो जाती है, जिससे उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इन समस्याओं को पहचानने और उनका सही समाधान करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र सिरोही द्वारा किसानों को नियमित रूप से मिट्टी और पानी की जांच कराने की सलाह दी जाती है। मिट्टी की जांच से किसानों को यह भी जानकारी मिलती है कि किस प्रकार की खाद कितनी मात्रा में और कब डालनी है। जब मिट्टी का संतुलन बनाए रखा जाता है, तो यह न केवल फसल की पैदावार बढ़ाने में सहायक होती है, बल्कि मिट्टी की प्राकृतिक संरचना भी बनी रहती है। किसानों को चाहिए कि वे निकटतम कृषि प्रयोगशाला में जाकर अपने खेतों की मिट्टी की जांच करवाएं और विशेषज्ञों की राय लेकर उचित उर्वरकों और सुधारकों का उपयोग करें।
मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सर्वोत्तम तरीका
फसल उत्पादन में संतुलन बनाए रखने के लिए जैविक और प्राकृतिक खादों का उपयोग आवश्यक होता है। गेहूं की कटाई के बाद मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए गोबर की खाद, कम्पोस्ट और जैविक खाद का प्रयोग अत्यंत लाभदायक होता है। जैविक खाद न केवल मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है, बल्कि उसमें लाभदायक जीवाणुओं की वृद्धि भी सुनिश्चित करती है, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है। गेंहू की कटाई के बाद किसान अक्सर कुछ समय के लिए अपने खेत को खाली छोड़ देते हैं। इस दौरान वे अपने खेत में हरी खाद या मूंग की फसल लगा सकते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित किया जा सके। मूंग जैसी दलहनी फसलें न केवल मिट्टी में नाइट्रोजन की आपूर्ति करती हैं, बल्कि खेत में हरी खाद के रूप में भी काम आती हैं। इसके अलावा, गोबर की खाद और कम्पोस्ट के उपयोग से मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, जिससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है और जल धारण क्षमता में भी सुधार होता है। कम्पोस्ट खाद के उपयोग से मिट्टी में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है, जिससे फसलों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। किसान चाहें तो स्वयं जैविक खाद तैयार कर सकते हैं या बाजार में उपलब्ध जैविक खादों का उपयोग कर सकते हैं। यह न केवल मिट्टी के लिए लाभकारी होता है, बल्कि रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को भी कम करता है
सही समय और सही विधि अपनाना
गेहूं की कटाई के बाद किसानों के लिए अगली चुनौती होती है कि वे अपने खेतों में कौन-सी फसल उगाएं। इस संदर्भ में, धान और मक्का की खेती एक उपयुक्त विकल्प हो सकती है। कटाई के बाद यदि मिट्टी में क्षारीयता अधिक हो, तो किसान धान की लवण सहनशील किस्मों जैसे सीएसआर-36 या सीएसआर-56 का चयन कर सकते हैं। ये किस्में खारे पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होती हैं।
धान की बुवाई से पहले खेत की उचित तैयारी आवश्यक होती है। किसानों को चाहिए कि वे जून महीने में धान की रोपाई से पहले अपने खेत की गहरी जुताई करें। यह प्रक्रिया मिट्टी की संरचना को सुधारती है और उसमें ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर करती है। इसके अलावा, धान की रोपाई के लिए उचित दूरी और रोपाई के समय सही जल प्रबंधन भी महत्वपूर्ण होता है। प्रत्येक पौधे को उचित मात्रा में पोषण और जल मिलने से उसकी वृद्धि में तेजी आती है और उपज अधिक होती है।
मक्का की खेती के लिए भी मिट्टी की गहरी जुताई आवश्यक होती है। मक्का की बुवाई से 10-15 दिन पहले खेत की तैयारी करनी चाहिए और मिट्टी में संतुलित मात्रा में जैविक खाद मिलानी चाहिए, जिससे उसकी उर्वरता बढ़े। इसके अलावा, बुवाई के समय मिट्टी की नमी का ध्यान रखना जरूरी होता है ताकि अंकुरण बेहतर हो।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक तरीका
हरी खाद मिट्टी के पोषण स्तर को सुधारने का एक प्रभावी और प्राकृतिक तरीका है। गेहूं की कटाई के बाद यदि किसान अपने खेतों में ढेंचा जैसी फसल उगाते हैं, तो यह मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाने में सहायक होती है। ढेंचा एक लवण सहिष्णु पौधा है, जो खारे और क्षारीय मिट्टी में भी अच्छी तरह से उगता है और मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा को बढ़ाता है। हरी खाद मिट्टी के जैविक तत्वों को संरक्षित रखती है और जल धारण क्षमता को भी बढ़ाती है। विशेष रूप से उन खेतों में जहां अधिक जलभराव होता है, वहां हरी खाद उगाने से मिट्टी की संरचना में सुधार आता है और फसल की जड़ें अधिक मजबूत होती हैं। किसानों को चाहिए कि वे अपनी फसल चक्र प्रणाली में हरी खाद को शामिल करें, जिससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहे।
नोट: रिपोर्ट में दी गई जानकारी किसानों के निजी अनुभव और इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से एकत्रित की गई है। किसान भाई किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृषि विशेषज्ञों की सलाह अवश्य लें।
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About the Author
मैं लवकेश कौशिक, भारतीय नौसेना से रिटायर्ड एक नौसैनिक, Mandi Market प्लेटफार्म का संस्थापक हूँ। मैं मूल रूप से हरियाणा के झज्जर जिले का निवासी हूँ। मंडी मार्केट( Mandibhavtoday.net) को मूल रूप से पाठकों को ज्वलंत मुद्दों को ठीक से समझाने और मार्केट और इसके ट्रेंड की जानकारी देने के लिए बनाया गया है। पोर्टल पर दी गई जानकारी सार्वजनिक स्रोतों से प्राप्त की गई है।